पहले ड्रैगन ज़मीन पर हारा. फिर आसमान में खाई शिकस्त. अब ड्रैगन पानी में डूबने की तैयारी कर रहा है. ये चालबाज़ चीन की एक और नई चाल है. वो झील में भारत को झांसा देने की कोशिश कर रहा है. लेकिन ड्रैगन ये नहीं जानता कि भारत भी उसकी चालाकियों से निपटने के लिए तैयार है.

  • नई दिल्ली,चीन अपने टोही विमान और तकनीक के सहारे एलएसी के करीब पैंगोंग त्सो लेक के नीचे पानी के अंदर झांकने की कोशिश में लगा है. सैटेलाइन तस्वीरों से साफ हुआ है कि चीन के सैन्य हवाई अड्डों में ऐसे कई विमान खड़े हैं, जो पानी के अंदर की हलचल का पता लगा सकते हैं. लेकिन सवाल ये है कि आख़िर चीन ऐसा कर क्यों रहा है? जानकारों की मानें तो असल में वो डरा हुआ है. उसे लग रहा है कि कहीं भारत पानी के रास्ते ही उस पर हमला ना कर दे.

    सबसे पहले ये समझते हैं कि आखिर झील में भारत को कैसे झांसा देने की कोशिश कर रहा है चीन. सैटेलाइट तस्वीरों से पता चला है कि चीन अब दुनिया भर की नौसेनाओं की पनडुब्बी रोधी युद्ध के लिए इस्तेमाल की जाने वाली नई तकनीक के सहारे पैंगोंग त्सो झील के अंदर, उसकी गहराई में भी नजर रख रहा है. लेकिन ये निगरानी क्यों. आखिर क्यों चीन को हर आहट पर डर लग रहा है.

    एलएसी पर टसल की शुरुआत बाद से पीपुल्स लिबरेशन आर्मी ग्राउंड फोर्स यानी PLAGF स्वीडिश CB-90 की तरह कॉपी किए गए हाई स्पीड गश्ती क्राफ्ट और टाइप 928D नावों के जरिए पैंगोंग त्सो झील पर निगरानी रखे हुए है. लेकिन सैटेलाइट तस्वीरों से पता चला है कि चीन अब दुनिया भर की नौसेनाओं द्वारा पनडुब्बी रोधी युद्ध के लिए इस्तेमाल की जाने वाली नई तकनीक के सहारे पैंगोंग त्सो झील के अंदर उसकी गहराई में भी नजर रख रहा है.

    आजतक तो मिली जानकारी के मुताबिक 31 जुलाई को फिंगर 4 और फिंगर 8 के बीच कम से कम 13 नावों के मौजूद होने की जानकारी मिली थी. नाव स्क्वाड्रन में रिमुतांग के एक प्रमुख बेस से कुनक फोर्ट और फिंगर 5 तक आठ नई और नावों को तैनात किया गया. जो कि फिंगर 4 से मुश्किल से 2.5 किलोमीटर दूर है.

    वहीं अब गहराई वाले इलाकों की नई सैटेलाइट तस्वीरें में खास तौर से चीनी सैन्य हवाई अड्डे पर कुछ बदलाव देखे गए हैं, जो अब से पहले नहीं दिखे. पीएलए वायु सेना ने पैंगोंग त्सो झील में पानी के नीचे की गतिविधियों की बारीकी से निगरानी शुरू कर दी है. PLAAF झील की टोह के लिए विशेष विमान इस्तेमाल कर रही है. जिसके पिछले छोर एक मैग्नेटिक एनोमली डिटेक्टर (MAD) लगा हुआ है.

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    ख़बर है कि चीन पनडुब्बियों का पता लगाने वाली तकनीक का इस्तेमाल कर रहा है. इन विशेष विमान, जैसे कि Y-8 GX6 या शांक्सी Y-8 ट्रांसपोर्टर के गाओक्सिन-6 या हाई न्यू 6 वैरिएंट का इस्तेमाल पीएलए नौसेना विरोधी सतह के साथ-साथ पनडुब्बी रोधी युद्ध के लिए करती है.

    जहाज पर लगा ये डिटेक्टर पृथ्वी के चुंबकीय क्षेत्र में किसी भी तरह के बदलाव को एक मिनट में पता लगा सकता है. जिसका इस्तेमाल पनडुब्बियों का पता लगाने के लिए किया जाता है. साथ ही जमीन के नीचे छिपे खनिज और दुर्लभ मिट्टी का पता लगाने के लिए भी उपयोग किया जाता है. इन विमानों को होटन, कोरला और वुदुन में सैटेलाइट इमेज पर देखा गया है.

    वुडुन हवाई अड्डे की लेटेस्ट सैटेलाइट इमेज से संकेत मिलता है कि 24 अगस्त को Y-8 GX6 को वहां पार्क किया गया था. इस विमान में पिछले दूसरों की तुलना में छोटा MAD बूम है. विमान पीले प्राइमर में है, ऐसा लगता है कि विमान की अभी टेस्टिंग चल रही है. ऐसे नए और छोटे एमएडी बूम के साथ कम से कम चार विमान हैं, जो जियान-यानलियांग एयरबेस में हैं, जहां उनका निर्माण होता है.

    मगर वहीं दूसरी तरफ भारतीय जवान भी पूरी तरह से मुस्तैद हैं. इंडियन आर्मी की इसी मुस्तैदी की वजह से एलएसी पर चीनी सैनिकों के होश गुम हैं. एलएसी के पास अब हालात ये है कि चीनी सैनिक फिंगर 4 की रिजलाइन पर हैं लेकिन उनकी हर गतिविधि पर भारतीय फौज की नज़र है क्योंकि पैंगोंग सो लेकर के दोनों किनारे सामरिक महत्व की सभी अहम चोटियों पर भारतीय सेना का नियंत्रण है. यही वजह है कि चीन अब घुसपैठ की कोई नई साजिश नहीं रच पाया. वरना मई महीने से वो जिस तरह एलएसी पर हरकतें कर रहा है, वो नाकाबिले बर्दाश्त है.

    एलएसी पर यथास्थिति बहाल करने के लिए हालांकि लगातार बातचीत चल रही है लेकिन लगता है कि चीन ये मसला बातचीत से हल करने के मूड में नहीं है. और वो भारत के सामने ऊटपटांग शर्तें रख रहा है. बहानेबाजी कर रहा है. कुल मिलाकर चीन तनाव कम करने में कोई सहयोग नहीं कर रहा.

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