मजबूत भारतीय अमेरिकी समुदाय का डेमोक्रेट्स को समर्थन हेल्थकेयर, इकोनॉमी, ब्रेड-बटर (रोजी-रोटी) जैसे मुद्दों से संचालित है न कि ट्रंप के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के साथ निजी संबंध को लेकर. हालांकि, अमेरिका-भारत संबंधों को लेकर ट्रंप की हैंडलिंग को लेकर भारतीय-अमेरिकी समुदाय लगभग बराबर बंटा नजर आता है.

रिपब्लिकन पार्टी के दावों के उलट, भारतीय अमेरिकी समुदाय का डेमोक्रेटिक पार्टी के साथ मोहब्बत का नाता जारी है. नहीं, वे शिप को नहीं छोड़ रहे और झुंडों में राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की ओर नहीं मुड़ रहे हैं.

एक नए सर्वे के मुताबिक रजिस्टर्ड वोटर्स में से करीब 72 फीसदी डेमोक्रेटिक उम्मीदवार जो बिडेन के पीछे खड़े हैं, वहीं राष्ट्रपति ट्रंप को 22 प्रतिशत का ही समर्थन प्राप्त है.

भारतीय और अफ्रीकी वंशावली से जुड़ीं महिला सीनेटर कमला हैरिस को बिडेन की ओर से अपने लिए उपराष्ट्रपति उम्मीदवार बनाना कुछ हद तक वोट जुटा रहा है, साथ ही डेमोक्रेटिक टिकट के लिए “अधिक उत्साह” का संचार कर रहा है.

डेमोक्रेट्स को समर्थन के पीछे हेल्थकेयर और इकोनॉमी के मुद्दे 

मजबूत भारतीय अमेरिकी समुदाय का डेमोक्रेट्स को समर्थन हेल्थकेयर, इकोनॉमी, ब्रेड-बटर (रोजी-रोटी) जैसे मुद्दों से संचालित है न कि ट्रंप के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के साथ निजी संबंध को लेकर.

हालांकि, अमेरिका-भारत संबंधों को लेकर ट्रंप की हैंडलिंग को लेकर भारतीय-अमेरिकी समुदाय लगभग बराबर बंटा नजर आता है. इस समुदाय से 33 प्रतिशत लोग जहां इसे अपनी मंजूरी देते हैं वहीं 37 प्रतिशत असहमत नजर आते हैं. वहीं 29 प्रतिशत की इस मुद्दे पर कोई स्पष्ट राय नहीं है. यहां देखना अहम है, समुदाय लगभग बराबर एक तिहाई-एक तिहाई बंटा हुआ है. ऐसे में ट्रंप-मोदी फैक्टर को खारिज नहीं किया जा सकता है.

सर्वे में ये सवाल था कि कौन सी पार्टी द्विपक्षीय संबंधों को बेहतर ढंग से संभालती है? यह सवाल सटीक जवाब जानने के लिए अपने आप में ही बहुत व्यापक है. सैंपल जो पहले ही डेमोक्रेट्स की ओर झुका है, सर्वे में 39 प्रतिशत भारतीय अमेरिकियों ने कहा कि डेमोक्रेट्स भारत-अमेरिका संबंधों का प्रबंधन करने में बेहतर थे, जबकि केवल 18 प्रतिशत ने कहा कि रिपब्लिकन बेहतर थे. यह महत्वपूर्ण है कि 26 प्रतिशत ने कहा कि दोनों में कोई अंतर नहीं है. वहीं 16 प्रतिशत ने कहा कि वो इस बारे में साफ तौर पर कुछ नहीं कह सकते.

ये सब दर्शाता है कि सवाल के साथ कुछ और जानकारी जुड़ी होनी चाहिए. साथ ही प्रतिभागियों के द्विपक्षीय संबंधों के सवाल से जुड़ने के लिए कोई और विशिष्टता जुड़ी होनी चाहिए. यदि सवाल में ‘कश्मीर’ शब्द होता, तो जवाब अलग हो सकते थे.

जॉन्स हॉपकिंस स्कूल ऑफ एडवांस्ड इंटरनेशनल स्टडीज, कार्नेगी एंडोमेंट और यूनिवर्सिटी ऑफ पेनसिल्वेनिया की ओर से 936 भारतीय अमेरिकी नागरिकों का सर्वेक्षण पिछले महीने किया गया था. यह उस हालिया नेरेटिव को खारिज करता है कि ट्रंप-मोदी की मजबूत दोस्ती, और हैरिस समेत कुछ डेमोक्रेट्स की ओर से की गई मोदी की नीतियों की आलोचना, भारतीय अमेरिकियों को खासी संख्या में रिपब्लिकन पार्टी की ओर मोड़ रही है.

रिपब्लिकन ऑपरेटिव्स ने बिना वैज्ञानिक सर्वेक्षणों के दावा किया है कि 2020 के चुनाव में भारतीय अमेरिकी वोट का लगभग 50 प्रतिशत ट्रंप को शिफ्ट हो जाएगा, मुख्यतः भारत की और ट्रंप की मजबूत तरफदारी की वजह से.

जॉन्स हॉपकिन्स में एशिया प्रोग्राम के डायरेक्टर देवेश कपूर ने कहा: “रिपब्लिकन को वोट शिफ्टिंग के बारे में इतना जो कुछ लिखा गया है वो किसी सर्वे के आधार पर नहीं है. मीडिया का ध्यान उनकी ओर सबसे ज्यादा जाता है जो सबसे ज्यादा शोर करते हैं.”

इससे भी महत्वपूर्ण, कपूर ने इंडिया टुडे को बताया कि सर्वे के निष्कर्ष “भारतीय नीति निर्माताओं को आगाह करने वाले हैं, जो एक ही तरफ (ट्रंप की ओर) अपनी सारी कोशिशें किए जा रहे थे. उनके लिए इतनी अच्छी खबर नहीं है, क्योंकि डेमोक्रेट्स के अब सत्ता में आने की संभावना अधिक है और भारत सरकार उनकी चिंताओं को लेकर थोड़ी ज्यादा खारिज करने वाली रही है.”

हालांकि कपूर को एक उम्मीद वाली बात ये नजर आती है- “चूंकि भारतीय अमेरिकी समुदाय से बहुत सारे डेमोक्रेटिक वोटर्स हैं, इसलिए वे डेमोक्रेटिक नेतृत्व को शांत या नर्म रखने में मदद कर सकते हैं.”

मोदी फैक्टर 

हालांकि, भारत और “मोदी फैक्टर” वोटर्स जो गुणाभाग करते हैं, उनमें शामिल हैं. यहां तक कि बिडेन समर्थक भी भारतीय प्रधानमंत्री को लेकर सकारात्मक रुख रखते हैं. सर्वे के मुताबिक अगर 0 से 100 के लोकप्रियता पैमाने पर मोदी को रखा जाए तो बिडेन समर्थक उन्हें 52 अंक देते हैं. वहीं ट्रंप समर्थक वोटरों की बात की जाए तो वो मोदी को इस पैमाने पर 76 अंक देते हैं. मोदी की लोकप्रियता इस बिडेन और ट्रंप की लोकप्रियता के बीच में कहीं टिकती है.

लेकिन जब इस कारण को लेकर गहराई में उतरा जाए कि भारतीय अमेरिकी समुदाय का झुकाव डेमोक्रेटिक पार्टी की ओर क्यों है, तो बड़ी संख्या का मानना है कि रिपब्लिकन पार्टी स्वागत योग्य नहीं है और वजह है इसकी माइग्रेशन (आव्रजन) को लेकर नीतियां और माइनॉरिटीज (अल्पसंख्यकों) को लेकर बर्ताव. वे रिपब्लिकन पार्टी पर इवैन्जेलिकल्स (ईसाई धर्म पुस्तक संबंधी) के प्रभाव पर सवाल करते हैं  लेकिन यही तथ्य ईसाई भारतीय अमेरिकियों को अपील करता है.

सर्वे शायद पहली बार स्थापित करता है कि ट्रंप के सबसे उत्साही प्रशंसक दक्षिणपंथी हिंदू नहीं बल्कि ईसाई भारतीय अमेरिकी हैं. ट्रंप के भारतीय अमेरिकी समर्थकों में 45 फीसदी ईसाई, 22 फीसदी हिंदू और 10 फीसदी मुस्लिम हैं. यह विश्लेषकों के लिए एक अहम डेटा पाइंट है.

भारतीय अमेरिकियों में से 23 फीसदी खुद को उदार (लिबरल) बताते हैं. वहीं 11 फीसदी खुद को बेहद उदार और 13 फीसदी थोड़ा उदार कहते हैं. इस तरह यह आंकड़ा कुल मिलाकर 47 फीसदी बैठता है जो वाम दिशा की ओर हैं.  रूढ़िवादियों (कंजरवेटिव्स) के तीन शेड्स से जुड़े भारतीय अमेरिकी 23 प्रतिशत हैं, जबकि 29 प्रतिशत की पहचान मॉडरेट (मध्यमार्गी) की है.

कपूर ने जोर देकर कहा कि कई भारतीय टीकाकारों और राजनीतिक वर्ग की सोच से अलग, भारतीय अमेरिकी समुदाय राजनीतिक और सामाजिक मुद्दों को लेकर औसत अमेरिकी या औसत भारतीय से कहीं अधिक उदार हैं.

भारतीय अमेरिकियों की मुख्य फिक्र क्या? 

महत्वपूर्ण माने जाने वाले नीतिगत मुद्दों की सूची में, सबसे ज्यादा भारतीय अमेरिकियों ने यानि 21 प्रतिशत ने इकोनॉमी (अर्थव्यवस्था) को सबसे ऊपर रखा. इसके बाद हेल्थ केयर (20 प्रतिशत), जातिवाद (12 प्रतिशत), टैक्स (9 प्रतिशत) और आव्रजन (7 प्रतिशत) का नंबर आया. दिलचस्प बात यह है कि भारत-अमेरिका संबंध मुद्दों में नीचे से दूसरे स्थान पर यानि सिर्फ सेक्सिज्म (लिंगवाद) से ही ऊपर रहे.

भारत-अमेरिका संबंध मुद्दे को कम महत्व मिलने से उन लोगों को दोबारा सोचना चाहिए जो मानते हैं कि भारत अमेरिकी समुदाय नीतिगत लक्ष्यों की उपलब्धि के लिए आसान वाहन मानते है. मोदी सरकार को एक विशेष नोट बनाना होगा. भारत में विभाजन, जो पहले की तुलना में अब अधिक स्पष्ट हैं, भारतीय अमेरिकी समुदाय में जिस तरह प्ले आउट हो रहा है, वो भारत सरकार के फायदे वाला नहीं हो सकता.

ये नए निष्कर्ष दोनों पार्टियों की ओर से भारतीय अमेरिकी समुदाय के वोटर्स को लुभाने की तमाम कोशिशों के बीच आए हैं. उनकी ओर अधिक ध्यान उनकी बढ़ी संख्या और राजनीतिक प्रक्रिया पर प्रभाव बढ़ने की वजह से है. सर्वे के अनुसार, 2000 और 2018 के बीच, भारतीय अमेरिकी आबादी लगभग 150 प्रतिशत बढ़ी, जिससे यह अमेरिका में दूसरा सबसे बड़ा अप्रवासी समूह बन गया है.

आज, भारतीय अमेरिकियों की संख्या लगभग 4.1 मिलियन यानि 41 लाख है लेकिन सिर्फ लगभग 2.62 मिलियन 26.2 लाख ही (अमेरिकी) नागरिक हैं. इनमें से जिन्हें वोट देने का अधिकार है वो 1.9 मिलियन (19 लाख) ही हैं यानि कुल अमेरिकी मतदाताओं के 1 फीसदी हिस्से से भी कम हैं.

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