संदर्भवश अशोक त्रिपाठी  प्रधान संपादक 9425037578
महाराष्ट्र में सरकार गठन को लेकर अब तक कोई नतीजा नहीं निकलने से राज्य की जनता पशोपेश में है। जनता से लेकर नेता तक सब केवल कयास ही लगाने की स्थिति में हैं। कोई दावे के साथ यह नहीं कह सकता कि कल महाराष्ट्र में क्या होगा! यह राजनैतिक अनिश्चितता और ऊहापोह की स्थिति भले ही राजनैतिक दलों के लिए ‘फायदे की सौदेबाजी के लिहाज से भले ही मुफीद हो, लेकिन राज्य की कानून-व्यवस्था, प्रशासनिक व्यवस्था, लोकतांत्रिक मूल्यों और राज्य की जनता के मूलभूत अधिकारों और हितों की दृष्टि से बिल्कुल ठीक नहीं है, या यह कहें कि ‘सर्वथा प्रतिकूल और जनहित विरोधी है। किसी भी निर्वाचन के समय तमाम बाधाओं और निजी परेशानियों के बीच मतदाता इसलिए लंबी लाइनों में लगकर मतदान करता है कि उसे एक जिम्मेदार सरकार मिले, जो पूरे पांच वर्षों तक जनता के हितों कां संरक्षित, संवर्धित और विकसित करने की दिशा में ठोस काम करे। पर ठोस काम तो छोड़ ही दीजिए, यहां तो काम शुरू ही नहीं हो पा रहा है। और इसके पीछे की मुख्य वजह यह है कि देश-प्रदेश के आका अपनी खूंटा बरदारी करवाने के लिए दूसरों के कंधों पर लदे पड़ रहे हैं, उन्हें इस बात की कोई चिंता नहीं है कि जनता किस हाल में है, वह जी रही है, या मर रही है… उनका शगल तो बस यह है कि सूबे में बिछी बिसात पर सत्ता की शतरंज में प्यादों के दम पर शह और मात का खेल जारी है। जनता ने जिन्हें बाजी जिताकर ‘सेवा का दायित्व सौपा था, वे सत्ता की रसमलाई अकेले-अकेले हजम करने के चक्कर में दुलत्ती पर उतर आए। हार-थक कर पूंंछ दबाए बैठी बिल्ली के भाग्य से छींका टूटने लगा तो वह हरकत में आ गई। जब उसे लगा कि यह उसके अकेले के वश की बात नहीं है तो उसने साझेदारी के लिए सहयोगी बिलौटे को भी बुला लिया। अब पड़ी शेर की जान आफत में… क्या करे… क्या न करे… इधर जाए… उधर जाए… समझ न आए किधर जाएं… उधर शाह मुंह मटकाए! ऐसे में ‘नेता-नाटक देखने वालों को मजा तो आ रहा है, पर अब क्या होगा का कीड़ा भी दिमाग में कुलबुला रहा है। अब हालत यह हो गई हैकि कि किसी को कुछ समझ ही नहीं आ रहा है। सत्ता की रेस में ‘अघाड़़ी और पिछाड़ी सबके दाव जनता देख चुकी है। अब सत्ता के इस मनोरंजक प्रहसन के ताजा प्रसंग की स्थिति यह है कि- संसद के शीतकालीन सत्र की शुरूआत में पहले तो संसद के उच्च सदन यानी राज्यसभा में अपने संबोधन के दौरान महाराष्ट्र के वर्तमान हालात में सत्ता की सूत्रधार या किंग मेकर राष्ट्रवादी पार्टी की ना सिर्फ जमकर तारीफ की बल्कि स्वयं अपनी पार्टी भाजपा को भी शरद पवार की पार्टी राष्ट्रवादी कांग्रेस से सीख लेने की नसीहत दे डाली। वहीं शतरंज के इस खेल में अपनी गोटी आगे बढ़ाते हुए शरद पवार बुधवार को संसद भवन में प्रधानमंत्री मोदी से मिलने जा पहुंचे। अब कहा यह जा रहा है कि मोदी-पवार की इस मुलाकात ने मुंबई की राजनैतिक शीत ऋतु में संभावना का नया अलाव जला दिया है, जिसके चलते न सिर्फ शिवसेना बल्कि कांग्रेस के खेमों में भी गुर्राहट और फुसफुसाहट सुनने को मिल रही है। पीएम मोदी और शरद पवार की मुलाकात से कांग्रेस नाराज है, पार्टी सूत्रों के मुताबिक दोनों नेता गलत समय पर मिले हैं। इधर शिव सेना भी बेचैन है और वह जानना चाहती है कि आखिर मोदी और पवार के बीच क्या बात हुई है? पवार से जब पूछा गया तो उन्होंने यही कहा कि वे महाराष्ट्र के किसानों के मुद्दे पर मोदी से मिले हैं। पर राजनैतिक सुगबुगाहट तो यही है कि-दोनों के बीच यही बात हुई होगी कि महाराष्ट्र के विधानसभा चुनाव परिणामों की खेती की फसल कैसे काटी जाए और इसका लाभ किसके खाते में जमा हो? कांग्रेस और शिवसेना दोनों जहां कह रहे हैं कि सरकार का गठन दिसंबर में हो जाएगा, वहीं राष्ट्रवादी कांग्रेस ‘बीरबल की खिचड़ी बनकर तैयार होने का इंतजार कर रही है। बार-बार करवट बदलती शिवसेना की बेचैनी ही दरअसल इस प्रसंग का मुख्य आकर्षण है वैसे भारतीय जनता पार्टी अब भी पूरी तरह से आश्वस्त दिख रही है कि राज्य में जो कुछ भी होगा वह उसके फायदे के रूप में ही दर्ज होगा। अमित शाह की मुस्कराहट और देवेन्द्र फड़णवीस की आश्वस्ति की वजह भी यही है। इधर संघ प्रमुख ने भी इशारों में यह समझाने का प्रयास किया है कि ‘आपसी लड़ाई और ‘बेवजह की जिद में नुकसान के सिवाय कुछ भी हासिल नहीं होगा। अब देखना यह होगा कि राज्य के ताजा राजनैतिक हालातों के बीच राज्य की जनता को कोई राहत मिलती भी है या नहीं। या फिर ‘किसानों की चिंता की आड़ में ‘अपने हित चिंतन का खेल ही चलता रहेगा। बात देवेन्द्र फडऩवीस, आदित्य ठाकरे या उद्धव ठाकरे के मुख्यमंत्री के रूप में ताजपोशी की हो या फिर मिलिंद देवड़ा या अजित पवांर की आंशिक संभावनाओं की, या फिर भाजपा-शिवसेना और कांग्रेस-राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी की भविष्य की हैसियत की हो अब वक्त आ गया है कि जल्दी ही कोई राह सूझे जिस पर चल कर महाराष्ट्र विकास की दौड़ में अपनी भागीदारी सुनिश्चित कर सके। बड़ा सवाल तो यह है कि क्या दिल्ली दरबार में महाराष्ट्र की सियासी तस्वीर तय होगी? जबकि चुनाव तो राज्य की जनता ने किया था। और यदि यही होना है तो फिर ‘मतदानÓ के लिए जनता से आग्रह करने के खेल का मंचन ही क्यों? आशा है सभी गतिरोधों को दूर कर सत्ताधीश गरीब जनता और मरते हुए किसानों की सुध लेने का ईमानदार प्रयास करने की कोशिश जरूर करेंगे।

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