मुख्यमंत्री कमलनाथ के निर्देश पर सरकार के आयुष विभाग ने शासकीय खुशीलाल आयुर्वेदिक महाविद्यालय को इस रिसर्च का जिम्मा दिया है. 

/भोपाल: कमलनाथ सरकार अब वो प्लान तैयार कर रही है, जिस रास्ते पर चलते हुए चीन जैसे देश ने नोबल अवार्ड हासिल कर लिया था. हम बात कर रहे हैं, चीन की उस मेडिसिन की जिसके आधार पर उसे नोबल अवार्ड मिल गया था. चीन के स्थानीय ग्रामीणों द्वारा उपयोग किए जाने वाले छिंगहाओसू नाम के एक औषधीय पौधे से मलेरिया जैसे रोगों की रोकथाम की जाती थी. चीन ने दुनिया को वैज्ञानिक तौर पर इसकी खासियतें बताईं, तो उसे नोबल अवार्ड से नवाजा गया. अब कमलनाथ सरकार उसी राह पर आगे बढ़ रही है, यहां ऐसी औषधियों की खोज हो रही हैं जो युगों से आदिवासियों की बीमारियों को ठीक कर रही हैं. लेकिन, अब तक उसे दुनिया में पहचान नहीं मिली है. यदि सब कुछ ठीक रहा तो चीन की तरह मध्य प्रदेश भी नोबल अवार्ड का हकदार बन सकता है.

मुख्यमंत्री कमलनाथ के निर्देश पर सरकार के आयुष विभाग ने शासकीय खुशीलाल आयुर्वेदिक महाविद्यालय को इस रिसर्च का जिम्मा दिया है. इसके पीछे सोच ये है कि मध्य प्रदेश की नर्मदा घाटी में कई औषधीय विशेषताएं हैं. यहां कई जड़ीबूटी का इस्तेमाल आदिवासी कर रहे हैं. लेकिन अब तक आयुर्वेद में इसकी गणना नहीं हो पाई है. नर्मदा घाटी का अमरकंटक इलाका, मंडला की पहाड़ियों, पचमढ़ी की पहाड़ियों समेत सतपुड़ा का जंगल, पेंच की वन्य संपदा, बैतूल छिंदवाड़ा का ताप्ती घाट, महेश्वर, जामगेट, झाबुआ, अलीराजपुर के कई ऐसे जंगल हैं जहां आदिवासी और ग्रामीण जंगलों की जड़ी बूटियों के इलाज पर ही निर्भर हैं. स्थानीय ग्रामीण इन्हें अचूक औषधि मानते हैं. मध्य प्रदेश की इन्हीं घाटियों में मौजूद मेडिसिनल प्लांट पर कॉलेज की स्पेशल टीम वैज्ञानिक अनुसंधान करेगी और निष्कर्ष को दुनिया तक पहुंचाएगी.

चीन के ग्रामीण इलाकों में छिंगहाओसू औषधि का उपयोग कर मलेरिया जैसी बीमारियों से सदियों से लोग ठीक होते रहे हैं. चीन के छिंगहाओसू पौधे में वैज्ञानिकों ने मलेरिया के प्लास्मोडियम फाल्सीफैरम को जड़ से खत्म करने का गुण पाया गया था. इस पौधे में मौजूद आर्टीमिसनिन नामक तत्व की वजह से ये खासियत इसे औषधीय पौधा बनाती है. 1984 में ये पौधा भारत में लाया गया जिससे मलेरिया जैसे रोगों का कारगर उपचार शुरू हो सका.

शासकीय खुशीलाल शर्मा आयुर्वेदिक कॉलेज के प्राचार्य उमेश शुक्ला कहते हैं कि फिलहाल हमारा ध्यान रिसर्च पर है. चीन की तरह नोबल प्राइस हासिल करना टारगेट नहीं है. लेकिन रिसर्च सफल रही तो चीन की तरह नोबल अवार्ड मिल भी सकता है. लेकिन हम मध्य प्रदेश में ऐसी कई जड़ीबूटियां पर रिसर्च करना चाहते हैं जो यहां मौजूद हैं लेकिन गुमनाम हैं, जिनको आयुर्वेद के पाठ्यक्रम में पहचान नहीं मिल पायी है. एमपी की इन औधषियों पर हम रिसर्च करके दुनिया भर में स्थापित करने की कोशिश करेंगे.  डॉक्टर शुक्ला बताते हैं कि कुल 13 करोड़ के इस प्रोजेक्ट में सबसे पहले 2 करोड़ रुपए जारी किए गए हैं, जिससे अमरकंटक की नर्मदा वैली में मौजूद उन औषधियों पर रिसर्च की जाएगी, जिनका इस्तेमाल आदिवासी बरसों-बरस से करके ठीक हो रहे हैं. आयुर्वेदिक कॉलेज की स्पेशल टीम उन जड़ी-बूटियों के औषधीय गुण का अध्ययन करेगी.

औषधियों की जानकार और आयुर्वेदिक डॉक्टर पूर्णिमा श्रीवास्तव कहती हैं कि मध्य प्रदेश सघन वन संपदा वाला प्रदेश है. यहां की हर घाटी में विशेष खासियतों वाली जड़ीबूटियां पायी जाती हैं. उनकी पहचान स्थानीय लोगों को है, लेकिन उसका दस्तावेजीकरण नहीं हुआ है. ये पहली बार होगा जब कमलनाथ सरकार ऐसा अध्ययन कराएगी. नर्मदा वैली तो क्या भोपाल की श्यामला पहाड़ी, केरवा और कोलार के जंगलों में भी औषधीय क्षमता के पौधों की भरमार है. इनपर गहन रिसर्च होगी तो दुनिया भर को फायदा मिल सकता है. ये मध्य प्रदेश के लिए रोजगार का नया ज़रिया भी साबित हो सकता है.

आयुष विभाग की मंत्री डॉ.विजय लक्ष्मी साधो कहती हैं कि हम मेडिसिनल प्लांट पर नए शोध कर रहे हैं. इसकी जागरूकता के लिए भी प्रयास किए जा रहे हैं, यहां तक कि आयुर्वेदिक मेडिकल कॉलेजों की खाली जमीन पर औषधीय पौधों का गार्डन बनाये जा रहे हैं. मध्य प्रदेश की सघन वन संपदा का भरपूर उपयोग हो और इसकी विशेषताएं दुनिया भर को पता लगे इसके प्रयास सरकार कर रही है.

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