संदर्भवश अशोक त्रिपाठी  प्रधान संपादक 9425037578

भारत की आजादी की कहानी लिखने वाले जिन लोगों के नाम हमें मुखजबानी याद है उनमें सबसे ज्यादा चर्चा गांधी जी की होती है। 2 अक्टूबर 1869 को पोरबंदर, गुजरात में श्री करमचंद गांधी के घर उनकी धर्मपत्नी पुतलीबाई की कोंख से जन्मे मोहनदास कानून की पढ़ाई करने विदेश प्रवास के दौरान यदि अश्वेत-भारतीय होने के कारण रंगभेदी नीति का शिकार नहीं होते तो शायद भारत को अंग्रेजों से आजाद होने में और बरसों लग जाते। भारत की आजादी में श्री मोहनदास करमचंद गांधी का अहम योगदान है। उन्हें बाद में बेरिस्टर के बजाय सबने महात्मा के रूप में पहचाना और स्वीकार किया तथा बापू जैसा सम्मानजनक संबोधन भी दिया। गांधी जी का दर्शन सत्य और अहिंसा पर आधारित है। आजादी के अलावा भी बहुत कुछ है जिसे प्राप्त करने में महात्मा गांधी ने हमारी बहुत मदद की है। इन कई नायाब चीजों में से एक है ‘स्वच्छता! गांधी जी का स्वच्छता के प्रति आग्रह पक्का था। सड़क से शौचालय तक स्वयं साफ करने में उन्हें कभी कोई संकोच नहीं हुआ। बल्कि वे इन कामों के लिए सदैव दूसरों को भी प्रेरित करते थे। उन्हीं की प्रेरणा का नतीजा है कि आज जब पूरा देश गांधी जी की 150 वीं जयंती मना रहा है तब गांधी की जन्मदात्री धरती गुजरात में ही जन्मे और पले-बढ़े गांधी दर्शन से प्रभावित हमारे यशस्वी प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र दामोदर मोदी ने गांधी जी की 150वीं जयंती के पावन अवसर को स्वच्छता से जोडऩे का अभिनव कार्य किया है। अपने पिछले कार्यकाल में प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी ने स्वच्छता के प्रति जनजागरण के लिए ‘स्वच्छता ही सेवा का नारा दिया था। वास्तव में यह वाक्य साबरमती के संत को विनम्र राष्ट्र की सच्ची श्रद्धांजलि थी। स्वभावत: भारतीय समाज स्वच्छता पसंद है, पर स्वच्छता को लेकर उसका दायरा संकुचित है। स्वच्छता से आशय हमारा समाज स्वयं के शरीर, घर और दुकान आदि की सफाई से ही ग्रहण करता है, व्यक्तिगत सफाई के प्रति आग्रह और सार्वजनिक रूप से अपने कर्तव्य का निर्वहन न करने के कारण भारत को दुनिया गंदा, धूल-धुएं से भरा, मैले-कुचैले और विषाक्त वातावरण वाले देश के नाते जानने लगी, जबकि सचाई यह है कि संसार में पवित्रता के लिए सर्वाधिक आग्रह भारत में ही है। सोचिए जहां यह कहा जाता हो कि ‘कुत्ता भी जहां बैठता है, वहां झाड़कर बैठता है। उस देश की सफाई के मामले में दुर्दशा है तो इसका कारण बस हमारी संकुचित मनोदशा ही है, कि हम बस इतना ध्यान रखते हैं कि हम स्वयं गंदे ना हों! यदि हम इसका त्याग कर पाए तो फिर हमारी प्रगति को कोई बाधित नहीं कर पाएगा। स्वच्छता जैसे मुद्दे पर मोदी सरकार की सीधी भागीदारी न सिर्फ लोगों को जगाने वाली है, बल्कि यही सोच हमारी समस्याओं और दुर्दिनों को खदेडऩे वाली भी है। गांधी जी के दृष्टिकोण से सोचेंगे तो मोदी का नारा ‘स्वच्छता ही सेवा ज्यादा कारगर लगेगा। आज का सच यही है कि अपने आसपास स्वच्छता रखने से बड़ी सेवा कोई दूसरी नहीं हो सकती। इसे ऐसे समझें… ज्यादातर बीमारियां अस्वच्छ वातावरण के कारण ही होती हैं। ऐसे में यदि हम ‘स्वच्छता स्वयंसेवक बनकर न सिर्फ व्यक्गित बल्कि सर्वव्यापी स्वच्छता पर ध्यान देते हुए अपने सामाजिक कर्तव्य का स्वप्रेरणा से क्रियात्मक क्रियान्वयन करने लगे और जहां कहीं गंदगी दिखी उसे हटाने में सच्चे मन से लग गए तो इस सेवाकार्य से हम अद्वितीय सिद्धि प्राप्त कर पाएंगे। स्वच्छता अच्छे स्वास्थ्य और अच्छा स्वास्थ्य समृद्धि की शत प्रतिशत गारंटी है। बल्कि यह भी कहा जा सकता है कि ‘स्वच्छता से समृद्धि संभव है। यही एक मात्र उपाय है जिससे न सिर्फ हम और हमारा परिवार बल्कि पूरी मानव जाति उन्नति के मार्ग पर आगे बढ़ सकती है। प्रधानमंत्री मोदी की सोच वाकई कई मामलों में इतनी जबरदस्त सिद्ध हुई है कि उनके परिणामों के कारण उनकी लोकप्रियता वैश्विक हो गई है। आज उन्हें ऐसे मजबूत नेता के रूप में देखा जाने लगा है जो पूरी दुनिया का नेतृत्व करने में सक्षम है। समय-समय पर मोदी की अपीलों का समाज पर जो व्यापक असर दिखाई दिया है, उसका एक बड़ा कारण यह भी है कि उनकी कथनी-करनी में अंतर नहीं है। लोगों को मालूम है कि मोदी जो दूसरों से कहते हैं, वह स्वयं भी करते हैं। गांधी जी का भी यही सद्गुण उन्हें विशेष बनाता था। गांधी जी की 150वीं जयंती पर सिंगल यूज (एक बार काम आने वाले) प्लास्टिक से मुक्ति का प्रधानमंत्री श्री मोदी का आग्रह जरूर रंग लाएगा। आज यदि पन्नी से आजादी मिलती है तो गली से गंगा और सड़क से सरयु तक हर कहीं इसका असर जरूर दिखेगा। इस बदलाव के सहारे भारत को गंदगी नहीं पवित्रता से भरे देश के रूप में पहचान फिर से प्राप्त होगी।

 

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