अपनी बात अभिनव त्रिपाठी  समूह संपादक 94251 94196

वर्तमान समाज गांव,नगर, महानगर में निवास कर रहा है। भारत की अर्थ व्यवस्था चरमराई हुई है। न व्यवसाय है और न रोजगार के लिए पूंजी है। ऐसा कोई साधन भी नहीं है कि व्यक्ति रोजगार के लिए कुछ करले। वर्तमान में भारत की 65 प्रतिशत जनता ग्रामीण क्षेत्रों में निवास करती है। अगर ग्रामीण क्षेत्र के विकास और नगरीय विकास की तुलना की जाए तो ग्राम पिछड़ेपन की निशानी हैंं। दोनों के विकास में बहुत बड़ा अंतर दिखाई देता है। कृषि की जमीन परिवार के बीच छोटे-छोटे टुकड़़ों में बंट गई जिससे कृषि अब लाभ का धंधा नहीं रही। अब खेती से परिवार का गुजर बसर होना भी संभव नहीं रहा है। किसानों के द्वारा आए दिन आत्महत्या करने के समाचार मीडिया की सुर्खियां बने हुए हैं। भारत कृषि प्रधान देश है, परंतु वर्तमान हालात में युवा वर्ग खेती करने से कतराता है। गा्रमीण युवा सुखद जीवन की तलाश में शहरों का रुख कर रहा है, और इस तरह ग्रामीण क्षेत्रों से लगातार लोगों का पलायन हो रहा है। पर ग्राम से शहर आने वाले हर व्यक्ति के सपने पूूरे नहीं हो पाते, क्योंकि यहां भी स्थिति जस की तस है। जनसंख्या दबाव के आगे सारे संसाधन औछे सिद्ध हो रहे हैं। अन्य देशों की बात की जाए तो हमारे पास उनसे कई गुना ज्यादा युवा शक्ति मौजूद है। पर हम उसका सही दिशा में उपयोग नहीं कर पा रहे हैं, और इसी कारण भारत की प्रतिभाएं विदेशों की ओर भी तेजी से उन्मुख हो रहे हैं। दूसरी और हमारी सरकार शहरों को स्मार्ट सिटी में तब्दील करने में ंजुटी हुई है। आज देश को स्मार्ट सिटी के निर्माण की नहीं, बल्कि स्मार्ट युवा को रोजगार की तलाश है। भारत अपनी संस्कृति और पारिवारिक मूल्यों के लिए जाना जाता है। हमारे पास पर्याप्त प्राकृतिक संसाधन उपलब्ध हैं। लेकिन हम तेजी से उनका दोहन शोषण की हद तक जाकर कर रहे हैं। देश में शिक्षा और स्वास्थ्य की हालत खराब है, बिजली, पानी, आवास आज भी एक बड़े वर्ग की पहुंच से काफी दूर है। वास्तव में ता हमारी चिंता अपने युवा को स्मार्ट बनाने की होना चाहिए क्योंकि हमारा युवा स्मार्ट हो गया तो फिर शहर तो क्या हमारे गांव भी स्मार्ट बन ही जाएंगे। आवश्यकता इस बात की है कि देश के हर क्षेत्र का सर्वांगीण और समान विकास हो, ग्राम, कस्बे, नगर, महानगर के आधार पर विकास के मामले में कोई भेदभाव नहीं होना चाहिए। जिस दिन विकास के मामले में ग्राम और शहर में कोई अंतर नहीं बचेगा, बस उसी दिन ग्राम से शहर की ओर होने वाला पलायन पूरी तरह से रुक जाएगा। आज हम अपने प्राचीन जीवन मूल्यों से कटे जा रहे हैं। संयुक्त परिवारों के बजाय आज एकल परिवारों का चलन बढ़ता जा रहा है। मनुष्य की इसी प्रवृत्ति के कारण गौमाता तथा अन्य जीवों की भी परवाह किसी को नहीं रही। धनी लोगों के भी घर तो बड़़े हैं, लेकिन इन लोगों के भी दिल अब पहले की अपेक्षा काफी तंग हो चुके हैं। आज लोगों के दिल में अपने ही परिवार के लोगों के लिए जगह नहीं बची है। हर देश की अपनी प्रकृति और अपना स्वभाव और संस्कृति, सभ्यता होती है। इसलिए हमेें पश्चिमी देशों का अंधानुकरण करने के बजाय अपने मूूल स्वरूप के अनुसार ही व्यवहार करना चाहिए। क्योंकि नकल में भी अकल की जरूरत होती है। बुद्धिमत्ता के अभाव में अच्छे काम भी जंजाल बन जाते हैं। इसलिए आवश्यक है कि अपने युवाओं के सर्वांगीण विकास की चिंता करते हुए हम निरंंतर आगे बढऩे के अवसर प्रदान करें। स्मार्ट सिटी के बजाय गांवों को स्मार्ट बनाने की ओर ध्यान देने की आवश्यकता है। अपने पारंपरिक स्वरूप को सहेजते हुए हमें खेती, शिक्षा, स्वास्थ्य और परंपरागत गृह उद्योग और धंधों को सुगम बनाने और प्राकृतिक संसाधनों का उपयोग कर तथा साफ-सफाई, आवागमन, पानी, बिजली जैसी मूलभूत सुविधाओं को उपलब्ध कराकर तथा रोजगार के साधन तथा अवसर सुगमता से उपलब्ध कराकर गांवों को भी स्मार्ट बनाने का प्रयास करना चाहिए, क्योंकि जब हर गांव स्मार्ट बन जाएगा तो फिर देश अपने आप स्मार्ट बन जाएगा, तब हमें विकास के लिए स्मार्ट सिटी की अवधारणा की आवश्यकता नहीं रहेगी। सुखी, स्वस्थ और संंपन्न जीवन का वास्तविक आधार ग्राम ही हैं, शहर नहीं, बस यही सोच हमें स्मार्ट बना सकती है।

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