रतलाम 2009 में अस्तित्व में आई रतलाम लोकसभा सीट अनुसूचित जनजाति के उम्मीदवार के लिए आरक्षित है। इस लोक सभा क्षेत्र में झाबुआ, थांदला, पेटलावद, जोबट, अलीराजपुर, रतलाम सिटी, रतलाम ग्रामीण एवं सैलाना विधानसभा सीटें आती हैं। 2009 के पूर्व इस क्षेत्र को झाबुआ के नाम से जाता था। परीसीमन के बाद पहली बार 2009 में यहां हुए आम चुनाव में कांंग्रेस के कांतिलाल भूरिया ने जीत दर्ज कराई थी। इस सीट पर उनका पर्याप्त दबदबा रहा है। 2011 की जनगणना के मुताबिक रतलाम की जनसंख्या 26,08,726 है, यहां की 82.63 फीसदी आबादी ग्रामीण और 17.37 फीसदी आबादी शहरी क्षेत्र में रहती है। यहां अनुसूचित जनजाति के लोगों की संख्या अच्छी खासी है, 73.54 फीसदी आबादी रतलाम की अनुसूचित जतजाति की है, जबकि 4.51 फीसदी आबादी अनुसूचित जाति की है। 2014 में रतलाम में 17,02,648 मतदाताओं में से 8,41, 701 महिला और 8,60,947 पुरुष मतदाता थे। 2014 के चुनाव में यहां 63.59 फीसदी मतदान हुआ था, तब मोदी लहर के चलते कांतिलाल भूरिया को भाजपा के दिलीप सिंह भूरिया ने मात दी थी।
2014 के लोकसभा चुनाव में भाजपा के दिलीप सिंह भूरिया ने कांतिलाल भूरिया को 1,08457 वोटों से हराया था, तब भाजपा के उम्मीदवार दिलीप सिंह भूरिया को 5,45,980 (50.43 फीसदी) और कांग्रेस प्रत्याशी कांतिलाल को 4,37,523(40.41 फीसदी) वोट मिले थे, तथा बसपा 1.71 फीसदी वोट लेकर तीसरे स्थान पर रही थी। कांतिलाल भूरिया को दिलीप सिंह भूरिया ही टक्कर देते थे। लेकिन उनके निधन के बाद भाजपा ने 2015 में इस सीट पर हुए उपचुनाव में दिलीप सिंह भूरिया की बेटी निर्मला भूरिया को कांंतिलाल भूरिया के विरुद्ध मैदान में उतारा, लेकिन वे चुनाव नहीं जीत सकीं और 88,877 मतों के अंतर से उन्हें हार का सामना करना पड़ा। तब कांतिलाल को 5,35,781 और निर्मला को 4,46,904 मत मिले थे। रतलाम के वर्तमान सांसद कांतिलाल भूरिया 1998, 1999 और 2004 में झाबुआ से और 2009 और 2015 में रतलाम से लोकसभा के लिए चुने गए, तथा मनमोहन सरकार में केन्द्रीय मंत्री रह चुके हैं। वे यूपीए-2 में भी कैबिनेट मंत्री रहे हैं। वर्तमान सौलहवीं लोक सभा में सांसद कांतिलाल भूरिया की संसद में उपस्थिति केवल 54 प्रतिशत ही रही, और उन्होंने एक भी बहस में हिस्सा नहीं लिया, न ही उन्होंने संसद में कोई सवाल ही पूछा। 2019 के रण में रतलाम से भाजपा ने जीएस डामोर को चुनावी अखाड़े में उतारा है। श्री डामर का मुकाबला भी कांतिलाल भूरिया से ही है। 2018 के विधान सभा चुनाव में उन्होंंने कांतिलाल के बेटे विक्रांत भूरिया को करीब 10 हजार मतों से हराया था। अब लोकसभा चुनाव में भाजपा ने उन्हें कांतिलाल के विरुद्ध आजमाने का फैसला किया है। भाजपा ने इस बार नया चेहरा उतारकर कांग्रेस के इस गढ़ में कांग्रेस को चुनौती दी है। आदिवासी बहुल इस सीट पर लंबे समय से इंदौर-दाहोद रेल लाइन और इंदौर-अहमदाबाद फोनलेन का काम पूरा नहीं होने के कारण ग्रामीणों में खासा आक्रोश है। देखते हैं इस बार के चुनावी आंकड़े का गणित किसके पक्ष में बैठता है, और जनता किसके हाथ में अपनी जिम्मेदारी की कमान सौपती है। आगामी 19 मई को यहां चुनाव होने वाले हैं।

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