फिनलैंड में इस रविवार को संसदीय चुनाव के लिए मतदान होना है. दुनिया का सबसे खुशहाल देश होने का गौरव हासिल करने वाले फिनलैंड में चुनावी मुद्दे भारतीय चुनावी मुद्दे से बहुत ही ज्यादा अलग हैं.

नई दिल्ली: भारत में इन दिनों लोकसभा चुनाव का माहौल है. पूरा देश चुनाव के रंग में रंगा हुआ है. देश में पहले चरण के चुनाव हो चुके हैं. अब अगले चरण के चुनाव गुरुवार 18 अप्रैल को होना है. वहीं दुनिया में कई दूसरे देशों में भी चुनाव का माहौल है जिनमें रविवार को ही फिनलैंड में चुनाव होना है. फिनलैंड को दुनिया का सबसे खुशहाल देश माना जाता है.  इस बार चुनावी मुद्दों में खुशहाली को कायम रखना भी देश के बड़ी चिंता बन गया है.

कैसा होता है फिनलैंड का चुनाव
फिनलैंड के सांसदों का चुनाव हर चार साल में एक बार होता है. संसदीय चुनावों के लिए देश को चुनावी जिलों में बांटा गया है. हर चुनावी जिले से कुछ संसदीय सदस्यों को चुना जाता है. एक चुनावी जिले से कितने संसदीय सदस्य चुने जाएंगे यह जिले की जनसंख्या पर निर्भर करता है. संसद के लिए कुल 200 सदस्य चुने जाते हैं.  संसद में 101 सदस्यों का गठबंधन सरकार बना सकता है. पिछले महीने ही फिनलैंड की सरकार ने बड़े सामाजिक और स्वास्थ्य सुधार के मुद्दे पर सहमति न होने के कारण अपना इस्तीफा दिया था. अब वर्तमान सरकार नई सरकार के आने तक बनी रहेगी और केवल केयरटेकर की भूमिका ही निभाएगी.

 

क्या है चुनाव पूर्व पार्टियों की स्थिति
इस बार के चुनाव में विपक्षी पार्टी सोशल डेमोक्रेटिक पार्टी (एसडीपी) के जीतने की संभावना बताई जा रही है. उम्मीद की जा रही है कि वह वर्तमान में सबसे बड़ी पार्टी केंद्रीय पार्टी को पीछे छोड़ देगी. इसके बाद राष्ट्रीय फिन्स पार्टी को दूसरा स्थान मिलने की उम्मीद हैं जिसके बाद राष्ट्रीय गठबंधन पार्टी (एनसीपी) का स्थान आने की उम्मीद है.

क्या हैं फिनलैंड में इस बार चुनावी मुद्दे 
इस बार चुनावी मुद्दें में जलवायु परिवर्तन भी एक प्रमुख मुद्दा बन रहा है. जलवायु परिवर्तन का मुद्दा तब और गरमा गया जब आईपीसीसी की ओर से जारी की गई रिपोर्ट में बताया गया कि दुनिया के पास जलवायु संकट की आपदा से बचने के लिए केवल 12 साल बचे हैं. आर्किटिक वृत पर स्थित फिनलैंड के लिए जलवायु परिवर्तन की वजह से आर्किटक क्षेत्र में बर्फ के ज्यादा पिघलने से फिनलैंड जैसे देश ज्यादा प्रभावित हैं जिससे फिनलैंड के लोगों ने वायुप्रदूषण एक गंभीर समस्या के तौर पर लिया है. इसके अलावा यहां के लोग शिक्षित होने के साथ ही जागरुक भी हैं. इसके लिए यहां  2029 तक कोयले का उपयोग पूरी तरह से बंद करने का फैसला किया गया था.

Finland Forssa

यह भी तो है अहम मुद्दा
इसके अलावा बूढ़ी होती आबादी की वजह से स्वास्थ्य और लोककल्याणकारी सुधार भी प्रमुख मुद्दा है. फिनलैंड इन्हीं सेवाओं के बलबूते पर दुनिया का सबसे खुशहाल देश रहा है. अब बूढ़ी होती आबादी की वजह से स्वास्थ्य सेवाओं पर दबाव बढ़ता जा रहा है जिसकी वजह से उन्हें सुधार की जरूरत है. देश की राजनैतिक पार्टियों में इन सुधारों के लेकर सरकार की भूमिका को लेकर ही मतभेद है.

क्या हुआ था पिछले महीने
चार साल पहले हुए चुनाव के बाद फिनलैंड में केंद्रीय पार्टी, फिन्स पार्टी और राष्ट्रीय गठबंधन पार्टी (एनसीपी) ने मिलकर सरकार बनाई थी. 2017 में फिन्स पार्टी ने हल्लाओ को अपना प्रमुख चुना जिसके बाद प्रधानमंत्री जूहा सिपिला ने इस फैसले को स्वीकार नहीं किया और कहा कि वे हल्लाओ के रहते प्रधानमंत्री नहीं रहेंगे. फिर भी इस गठबंधन की सरकार बच गई जब फिन्स पार्टी के 20 सांसद ने पार्टी छोड़ दी. मार्च में संकट आया जब सिपिला सरकार ने स्वास्थ्य और अन्य सुधारों के मद्दे पर इस्तीफा दे दिया. कहा जाता है कि यह चुनावी रणनीति के तहत किया गया था.

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