संदर्भवश अशोक त्रिपाठी  प्रधान संपादक 9425037578

हिंदी पत्रकारिता का इतिहास बड़ा ही उज्ज्वल एवं गौरवशाली है। हिन्दी के पहले समाचारपत्र उदन्तमार्तंड से लेकर समय जगत तक की यात्रा के क्रम में पत्रकारिता ने लंबा रास्ता तय किया है। हंस, सरस्वती, कर्मवीर, स्वदेश और पाचजन्य जैसे पत्र- पत्रिकाएं हिंदी पत्रकारिता की रीढ़ हैं । इन्होंने ही हिंदी में राष्ट्रभाषा के रुप में स्थापित होपाने की क्षमता विकसित की और वैचारिक रूप से अपना सामर्थ्य सिद्ध करने के लिए पर्याप्त फलक भी उपलब्ध करवाया। भारत की आजादी के संघर्ष और बलिदान के इतिहास में हिंदी पत्रकारिता की महत्वपूर्ण भूमिका दिखाई देती है। हिंदी पत्रकारिता के सहयोग के बिना क्या देश भर में आजादी की अलख जगाना संभव था? क्या बगैर पत्रकारिता के विभिन्न जातियों एवं समाज में बंटे हुए लोगों को एक जाझम पर बैठा पाना संभव था? क्या विधर्मी अंग्रेजों के विरुद्ध भारतीयों को भावनात्मक रूप से एकजुट करना संभव था? उत्तर एक ही है, नहीं! बिल्कुल नहीं । बगैर पत्रकारों के सहयोग के इतना बड़ा जन आंदोलन खड़ा हो पाना संभव ही नहीं था। गौरो के द्वारा भारतीयों पर किए जाने वाले अत्याचारों की कहानियाँ अखबार के अलावा भला आम जनता तक कौन पहुंचा पाता? अखबारों के बिना आखिर कौन क्रांतिकारियों के उत्तेजक विचारों को आम जनता तक पहुंचा पाता? देश के कोने-कोने में होने वाले विरोध प्रदर्शन, धरना आन्दोलन एवं क्रांतिकारियों के संदेश और उनकी गतिविधियों के समाचार केवल अखबारों के माध्यम से ही जन सामान्य तक पहुंच पाते थे। पत्रकारिता की धार को सिद्ध करने के लिए ही कभी भारतेंदु हरिश्चंद्र ने कहा था- “न तीर निकालो, न तलवार निकालो। दुश्मन हो मुखातिब तो अखबार निकालो”। हिंदी पत्रकारिता ने आजादी के आंदोलन में ही अकेला सहयोग नहीं दिया बल्कि आजादी के बाद भी देश को सही दिशा और दशा तक पहुंचाया । अखबारों ने सदैव सरकारों को जहाँ सही नीतियों के लिए प्रोत्साहित किया, वही गलत नीतियों के लिए बार-बार टोका भी। यही कारण है कि पत्रकारिता को भारतीय लोकतंत्र का चौथा स्तंभ तक कहा जाता है। भारतीय लोकतांत्रिक व्यवस्था में व्यवस्थापिका, कार्यपालिका एवं न्यायपालिका के मुकाबले पत्रकारिता की भूमिका भी किसी भी तरह से कम नहीं है। सरहद पर संगीन लेकर खड़े सैनिक और हाथ मे में डंडा लेकर पहरा देने वाले सिपाही का जितना महत्व है, उतना ही महत्व देश के कोने- कोने में घटी घटनाओं को एकत्रित कर समाज तक समाचार पहुंचाने वाले पत्रकार का भी है। वही यहाँ-वहां की खबरें समाज तक पहुंचाता है। लेकिन किसी कोने में घटित घटना को जस का तस बताना भर पत्रकार का काम नहीं है, बल्कि उसका काम तो विचारों का भावनात्मक एवं तथ्यपरक ज्वार उठाना है। पत्रकारिता का कार्य जागरण है। भावों का जागरण, विचारों का जागरण, कर्तव्य निर्वहन के प्रति उत्साह का जागरण ये सब पत्रकारिता के पावन ध्येय है। पत्रकारिता में जितना महत्व शब्दों एवं समाचारों के प्रस्तुतीकरण का है, उससे कई ज्यादा महत्व संवेदना और मानवीय पक्ष को उभारना है। चिकने कागज पर रंगीन फोटो के साथ मसालेदार खबरें और धमाकेदार खुलासे भर ही केवल पत्रकारिता नहीं, बल्कि मानवीय संवेदना को जगाकर श्रेष्ठतम आदर्शों के प्रति जन सामान्य को जागरुक बनाने का कार्य भी पत्रकारिता का ही दायित्व है। लेकिन वर्तमान दौर में पत्रकारिता अपने अस्तित्व पर मंडरा रही चुनौतियों से जूझ रही है। यह संक्रमणकाल के साथ ही आपातकाल भी है, जिससे बाहर आने का प्रयास स्वयं पत्रकारिता को ही करना होगा। इस भंवर से पार उतरनेे में उसकी मदद कोई दूसरा नहीं कर सकता। पत्रकारिता प्रभाव का नहीं स्वभाव का नाम है। पत्रकारिता वह मशाल है जिसमें तेल बनकर पत्रकार का खून एवं पसीना जलता है। दुनिया को आत्मज्ञान की रोशनी से रोशन करने के लिए पत्रकार को अपना घर जलाना पड़ता है। भूखों की आवाज बनने के लिए उसे खुद भूखा रहना पड़ता है। लोगों के कंठ तर करने के लिए उसे स्वयं प्यासा रहना पड़ता है। दबंगो के हंटर सीने पर झेलने पडतेे हैं। अर्थ के अभाव में बगैर दवाई के या डंपर के नीचे आकर न जाने कितने पत्रकार अपना जीवन गंवा बैठे! लेकिन विपरीत परिस्थितियों के बावजूद आज बहुत से पत्रकार अपना धर्म तत्परता से निभा रहे हैं। वे न सिर्फ समाचार बल्कि विचार भी पहुंचा रहे हैं। पत्रकारिता वह जुनून है जिसमें देशप्रेम और कर्तव्यपरायणता तथा दीन-हीन, शोषित, वंचितों के प्रति मानवीय संवेदना से भरी हुई एक सार्थक टीस भी है। सृष्टि के पहले पत्रकार देवर्षि नारद ने पत्रकारिता के जो मानदंड स्थापित किए वास्तव में वही पत्रकारिता के स्वस्थ और आदर्ष मानदंड हो सकते हैं, उन्हीं पर चलकर पत्रकारिता जन कल्याणकारी और लोक मंगलकारी हो सकती है तथा प्रकृति, संस्कृति का हित संरक्षण कर सकती है। नए को पुरानो के प्रति संवेदनशील होने का भाव सिखा सकती है। इसलिए प्रयास होना चाहिए कि अखबार समाचार की सीमा से उठकर विचार की परिधि तक भी पहुँचना चाहिए। समाज से सम्मान चाहिए तो अपने कर्तव्यों का भान होना ही चाहिए। सहयोग चाहिए तो सद्भाव बरसाना ही होगा। स्वामी विवेकानंद के द्वारा स्थापित आदर्शों पर चल कर भारतवर्ष को जाग्रत और जागरूक राष्ट्र बनाने के लिए समय जगत समूह कटिबद्ध है। हमने कभी अपने हित के लिए पत्रकारिता अथवा समाज हित को नहीं दबाया। समय जगत का उद्देश्य पाठकों में विचारों की स्वच्छता एवं आदर्श की स्थापना करना है। अपने स्थापना काल से ही समय जगत समूह श्रेष्ठ उद्देश्य को लेकर चलता आया है, विश्वास कीजिए आगे भी हम अपना दायित्व इसी प्रकार निभाते रहेंगे। हम सरकार के पैरोकार नहीं, बल्कि संस्कारों की रक्षक जनहितैषी पत्रकारिता के प्रबल पक्षधर हैं। हम चाहते हैं हिंदी पत्रकारिता उस मुकाम तक पहुंच सके, जहाँ पहुंचाने के लिए कभी श्रद्धेय भारतेंदुु हरिश्चंद्र, माखनलाल चतुर्वेदी, गणेशशंकर विद्यार्थी, माधवराव सप्रे, अटल बिहारी वाजपेई, वचनेश त्रिपाठी, जैसे समर्थ पत्रकारों ने सपना देखा था। पत्रकारिता हमारे लिए व्यवसाय, रोजगार का साधन या दुकानदारी नहीं। किसी माफिया या बिल्डर को डराने, दबाने, चमकाने का कारोबार भी नहीं। पत्रकारिता के जन्म से लेकर उसकी वर्तमान स्थिति तक ना जाने कितने क्रांतिकारियों, विचारकों एवं पत्रकारों ने ना सिर्फ खून एवं पसीना बहाया, बल्कि उनके घर भी उजड़े हैं, उनके निजी सपने टूटे हैं। चूंकि व्यक्ति के मुकाबले परिवार, परिवार के मुकाबले मोहल्ला, मोहल्ले के मुकाबले गांव, गांव के मुकाबले जनपद, जनपद के मुकाबले जिला, जिले के मुकाबले राज्य, राज्य के मुकाबले राष्ट्र, राष्ट्र के मुकाबले विश्व का सुख ही महत्वपूर्ण है। इन हितों की रक्षा केवल तब की जा सकती है जब पत्रकार निष्पक्ष और निरपेक्ष भाव से पूरी ईमानदारी से कार्य करते रहें।

LEAVE A REPLY