संदर्भवशअशोक त्रिपाठी
प्रधान संपादक 9425037578
राजनैतिक प्रतिद्वंद्विता और स्वार्थान्धता में भाषा और भावों का शोषण इतने निर्लज्ज स्तर पर पहुंच गया है कि इसके अतिक्रमणकारी स्वभाव के कारण संंसदीय परंपराएंं, सौजन्यता और सद्भाव किसी अंधेरे कक्ष के कोने में पश्चाताप की जमीन पर पाप के बोध से संतप्त अपराधी की तरह घुटनों में मुंह छुपाकर निश्चेष्ट बैठे प्रतीत होते हंंै। केवल अपने स्वार्थों की साधना ही जहां जनसेवा का पर्र्याय और ‘रागनीति ही जहां राजनीति का द्योतक हो जाए और जहां ‘द्वैष की सीमाएं देश से भी बड़ी हो जाएं वहां सत्य, प्रेम, करूणा, न्याय और आदर्श ये सारे के सारे ही शब्द बकलोली या शाब्दिक जुगाली से ज्यादा हैसियत नहीं रखते। तोहमतों के पत्थर ही सद्भाव की हत्या के दोषी होते हैं। इसलिए भाव और भाषा के हत्यारों को ही सबसे पहले सूली पर चढ़ाया जाना चाहिए। बयानों और नारों से पैदा हुई सुर्खियों से ‘राजनीति की दाल’ में ‘तीखे तेवर का तड़का लगाने वाले और नफरत की आंच पर स्वार्थ की रोटियां सेंकने वाले लोग कैसे प्रेरक और प्रामाणिक नेतृृत्व करने में सफल हो सकते हैं? जिनके सड़कछाप आचरण और दो कोड़ी की सोच दुनिया के सामने हमें सिर झुकाने को मजबूर कर दे, ऐसे लोग क्या हमारे नेता हो सकते हैंं? संवैधानिक व्यवस्था के शीर्ष पर बैठे व्यक्ति के लिए अभद्र, अनैतिक और ओछी भाषा का प्रयोग क्या हमें ऐसी भाषा बोलने वालों की वास्तविकता से परिचित नहीं कराती? और क्या स्तरहीन भाषा का जवाब भी स्तरहीन हो यह आवश्यक है? अब ऐसे ही सारे विषयों पर गहन मंंथन करने का समय आ गया है। हांलांकि अब हमारी क्षमताएं नहीं बचीं कि हम भाषायी अत्याचार और उत्पीडऩ का विरोध करने के लिए कोई ऐसा तीर उठा सकें जो लक्ष्य भेद कर फिर से तरकश में ज्यों का त्यों लौट पाए, अगली बार अगले निशाने पर फिर सटीक बैठने के लिए। इसीलिए हमारे लोकतांंत्रिक समर में समस्याओं के लक्ष्य भेदन के लिए फिर ‘वही अर्जुन-वही बाण अपेक्षित है। जिस संसद भवन ने श्रद्धेय अटल जी की सरस वाणी में ”गीत नया गाता हूं… का अजेय स्वर सुना, उसी को अब ‘चौकीदार ही चोर है सुनना पड़ रहा है। कोई देश के मुखिया को ‘चायवाला कहता है, तो कोई ‘नीच तक कह देने और कोई उनके स्वर्गवासी पिता और बूढ़ी मां तक के लिए अपशब्द का प्रयोग करने का दुस्साहस कर बैठता है। कोई बस अपनी ही धकाने के लिए शोर मचाकर संसद नहीं चलने देता, कोई अड़ीबाजी में दो कदम आगे बढ़कर सदन से बहिर्गमन कर जाता है। ऐसी स्थिति में निस्वार्थ मतदाता जिसे जनता जनार्दन के नाम से भी संबोधित किया जाता है (जिसमें देश की सुरक्षा के खातिर दुश्मन की गोली खाने वाला जवान, खेतों में अन्न उपजाकर हमारे पेट के कोठों को भरने वाला अन्नदाता किसान, ताजमहल से लेकर संसद भवन तक और ‘आनंद भवन से लेकर ‘दस जनपथ तक का निर्माण करने वाला मजदूर और सांसदों, विधायकों, मंत्रियों और अफसरों के बच्चों की उदरपूर्ति से लेकर, उनके आरामगाह, ऐशगाह और लक्जरी ‘जीवन शैली (?) के सकल निर्वाह की व्यवस्था जिसकी गाढ़ी मेहनत की कमाई से होती है वह ‘आम आदमी भी शामिल है)। क्या उसके पास अधिकार नहीं होना चाहिए कि वह अपने ‘नालायक प्रतिनिधियों के (जो ‘सेवक होने का ढोंग कर ‘स्वामी होने की स्थिति में पहुंच चुके हैं)। कान उमेठ सके। सेना के पराक्रम पर सवाल उठाने वाले, दुश्मन को गले लगाने वाले, देश से बाहर जाकर ऊटपटांग बयान देकर और फर्जी आंकड़े जारी कर जनता को गुमराह करने वाले नकलची लोग क्या दूसरी बार फिर से ‘संसदीय बोर्ड परीक्षा में बैठने के लायक भी हैंं? इस विषय पर निर्वाचन आयोग को भी विचार करना चाहिए। क्या झूठ बोलना, षड्यंत्र रचना, बगेर अनुभव और पात्रता के देश के सर्वोच्च सदन में पहुंच जाना राष्ट्रीय मूल्यों के साथ घटित हुआ गंभीर अपराध नहीं माना जाना चाहिए? क्या ऐसे दुष्कृत्यों के दोषियों को कड़ी से कड़ी सजा नहीं मिलना चाहिए। सही हो तो बताईये, हमें भी और अपने आप को भी। ताजा मामला रविवार को अमेठी में एके-203 राइफलों की निर्माण इकाई के उद्घाटन के दौरान प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी द्वारा की गई घोषणाओं पर कांग्रेस अध्यक्ष की नाराजगी से उपजा। उद्घाटन के अगले दिन श्री राहुल गांधी ने ट्वीट किया- ”प्रधानमंत्री जी, अमेठी की ऑर्डिनेंस फैक्ट्री का शिलान्यास 2010 में मैंने खुद किया था। पिछले कई सालों से वहां छोटे हथियारों का उत्पादन चल रहा है। कल आप अमेठी गए और अपनी आदत से मजबूर होकर आपने फिर झूठ बोला। क्या आपको बिल्कुल भी शर्म नहीं आती कांग्रेस अध्यक्ष के ‘बयान की ईंट का जवाब अपनी ‘प्रतिक्रिया के पत्थर से दिया केन्द्रीय मंत्री श्रीमती स्मृति ईरानी ने। उन्होंने बगेर कोई मौका गवांए ट्वीटर पर ही तंंज कसा-”शिलान्यास नहीं सत्यानाश किया है अमेठी में आपने। झूठ कितने बोले अमेठी से, आज चलो फिर से उनका पर्दाफाश करते हैं। यहां समझने वाली बात यह है कि चूूंकि एक तो नेताओं के सिर मजबूत होते हैं, और दूसरे इनकी सुरक्षा चाक-चौबंध होती है इसलिए दोनों पक्षों के नेता इस भीषण ‘वाकयुद्ध की पत्थरबाजी से बच गए, लेकिन बेचारी और निरीह जनता का एक बार फिर से सिर फूट गया। अब वह अंंधेरे कमरे में अपने ‘मतदाता होने की नियति पर पश्चाताप कर रही है।

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