संदर्भवश… त्रिपाठी
प्रधान संपादक 9425037578

विश्व की समस्त शासन व्यवस्थाओं में भारत की गणतांत्रिक व्यवस्था का महत्व सर्वोपरि है। कारण यह है कि यह पूरे संसार में प्रचलित शासन व्यवस्थाओं का समेकित और श्रेष्ठतम स्वरूप है। स्वतंत्र भारत की संविधान निर्मात्री सभा ने समस्त प्रचलित व्यवस्थाओं के संविधान प्रारूपों का गहन अध्ययन, विश्लेषण और मंथन करने के बाद उसे भारत के सभी निवासियों की सुरक्षा, विकास और कल्याण के लिए उन्हें अधिकार प्रदान करने तथा उनपर कर्तव्यों का अधिरोपण करने तथा महान राष्ट्र की शासन व्यवस्था के सुव्यवस्थित संचालन के लिए कानून का निर्माण किया। भारत का संविधान एक ऐसा लिखित दस्तावेज है जिससे पूरी शासन प्रणाली संचालित होती है। इसकी सुनम्यता और सौम्यता संंशोधनों में अंतर्निहित है। इसमें संघ और उसका राज्यक्षेत्र, नागरिकता, मूल अधिकार, राज्य के नीति निर्देशक तत्व, मूल कर्तव्य, संघ एवं राज्य के व्यवस्था संचालन, प्रक्रियाओं, न्यायालय की शक्तियों, सरकारी कार्यों के संचालन, विधायी और वित्तीय विषयों के संबंध में प्रक्रिया, संघ और राज्यों के बीच संबंधों के निर्धारण तथा विधायी शक्तियों के वितरण, वित्त, संपत्ति, संविदा और वादों के व्यवस्थापन, व्यापार, वाणिज्य, समागम, अधिकरण, निर्वाचन, आपात उपबंध और संशोधनों के लिए ऐसी सुव्यवस्था की गई है जिसके परिणाम स्वरूप भारत का संविधान विश्व का सबसे श्रेष्ठ संविधान बन गया है।
हमारे संविधान की उद्देशिका में स्पष्ट रूप से लिखा गया है कि- ‘हम, भारत के लोग, भारत को एक बनाने के लिए, तथा उसके समस्त नागरिकों को : सामाजिक, आर्थिक और राजनैतिक न्याय, विचार, अभिव्यक्ति, विश्वास, धर्म और उपासना की स्वतंत्रता, प्रतिष्ठा और अवसर की समता प्राप्त करने के लिए, तथा उन सबमें व्यक्ति की गरिमा और राष्ट्र की एकता और अखंडता सुनिश्चित करने वाली बंधुता बढ़ाने के लिए दृढ़ संकल्प होकर अपनी इस संविधान सभा में इस संविधान को अंगीकृत, अधिनियमित और आत्मार्पित करते हैं।Ó उपरोक्त वाक्य हमारे संविधान की आत्मा है।
हमारा संविधान 26 नवंंबर, 1949 को आकार लेकर आज ही के दिन 1950 में लागू होगया और इस प्रकार प्रतिवर्ष 26 जनवरी को गणतंत्र दिवस मनाया जाने लगा। वास्तव में यह दिन ‘गणÓ के ‘तंत्रÓ के ‘उत्सÓ का दिन है। आशा और उमंगों का दिन है। अधिकार और कर्तव्यों के स्मरण का दिन है। … और दिन है उन महान बलिदानियों के स्मरण का जिन्होंने पुण्य वसुंधरा भारतमाता को विदेशी आक्रांताओं के षड्यंत्र पाश और क्रूर चंगुल से आजाद कराने के खातिर अपना सबकुछ होम दिया। 15 अगस्त 1947 को आई आजादी की सुबह त्याग और बलिदान की सुर्खियों से सजकर आई थी। फांसी के फंदों पर लटकते कंठों का वंदेमातरम का तराना कितना करूण और कितना भावसंपन्न होगा इसका जो अंदाजा लगा पाएगा उसे कभी इस गान से परहेज नहीं होगा। इसके इतर जो लोग वंदेमातरम का विरोध करते हैं उनसे हम यह नहीं कहते कि वे कहीं ओर चले जाएं लेकिन उन्हें स्वयं आत्मसमीक्षा करना चाहिए कि आखिर वे किस स्तर के लोग हैं! इतने श्रेष्ठ संविधान के निर्माण और आत्मार्पण के पश्चात तो हमारे देश में कोई समस्या बचनी ही नहीं चाहिए थी, परंतु यह यथार्थ है कि हम कई ऐसी समस्याओं से जूझ रहे हंै जिनसे पार पाना आसान नहीं है। आप मानें या ना मानें पर इन सब समस्याओं का कारण भी और निदान भी, हम स्वयं ही हैं। जब तक हम अधिकार और कर्तव्यों की जंग में अपने स्वार्थ को त्याग कर परमार्थ की हित साधना का अभ्यास नहीं करेंगे तब तक सारी समस्याएं वर्तमान रहेंगी ही। सबके हित में अपना हित, और सबके सुख में अपना सुख खोजकर ही हम सर्वकामतृप्तावस्था में पहुंचकर स्वतंत्रता के सुख की वास्तविक अनुभूति कर पाएंगे।
गणतंत्र दिवस के इस पुनीत अवसर पर आप सबको अनेकश: शुभकामनाएं। भगवान गणपति का विघ्नविनाशक स्वरूप, मंगलमूर्ति बनकर जन-मन को उल्लास और उमंग की दैवीय तरंग का परमोत्कर्ष प्रदान करे।

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